
हरिद्वार। श्रावण मास के सोमवारों का सनातन परंपरा में विशेष महत्व है। यह पर्व केवल एक व्रत या रीति-रिवाज नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, मन की शांति और जीवन के अंधकार को दूर करने का सशक्त माध्यम है। पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी, हरिद्वार के सचिव महंत रामरतन गिरी जी के अनुसार, श्रावण सोमवार वैदिक परंपरा का एक ऐसा “जीव-चेतना जागरण उत्सव” है, जो भगवान शिव की कृपा से मनुष्य को भय, पीड़ा और कर्मबंधन से मुक्ति दिलाता है।
वैदिक मान्यताओं के अनुसार, श्रावण मास वर्षा ऋतु में आता है, जब प्रकृति में शीतलता और नमी होती है। यह समय ऋषियों की साधना और तपस्या का रहा है। सोमवार का दिन चंद्रमा (मन के स्वामी) और भगवान शिव (चंद्रशेखर) से जुड़ा है, जो मन की चंचलता को नियंत्रित करते हैं। श्रावण सोमवार का व्रत करने से न केवल आध्यात्मिक लाभ मिलता है, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी सुधरता है।
इस दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करने, शिवलिंग का दूध, जल, बेलपत्र और भस्म से अभिषेक करने तथा “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करने की परंपरा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी मास में समुद्र मंथन से निकले विष का पान करके भगवान शिव नीलकंठ कहलाए और माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर शिव को प्राप्त किया।
आधुनिक युग में भी श्रावण सोमवार की प्रासंगिकता बनी हुई है। यह तनावग्रस्त जीवन में शांति, पारिवारिक सामंजस्य और नैतिक मूल्यों की रक्षा का माध्यम है। महंत रामरतन गिरी जी के अनुसार, “शिवो भूत्वा शिवं यजेत्” – यानी शिव को पाने के लिए स्वयं शिवतुल्य बनना होगा। श्रावण सोमवार का यही गहन संदेश है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
