9 अगस्त: ‘मूल निवासी दिवस’ की साजिश बनाम भारत का सांस्कृतिक सत्यडॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे

कौन है भारत का ‘मूल निवासी’?

भारत में “मूल निवासी” शब्द एक अंतरराष्ट्रीय अवधारणा का विकृत रूप है, जिसका उद्देश्य है भारत के पारंपरिक ताने-बाने को बाँटना। 9 अगस्त को मनाया जाने वाला “World Indigenous Peoples Day” मूलतः उपनिवेशवाद से पीड़ित जनजातियों के अधिकारों हेतु घोषित था, परंतु भारत में इसे “ब्राह्मण बनाम आदिवासी” जैसा घातक विमर्श देने की कोशिश की जा रही है।इस विमर्श का आधार है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, जबकि सनातन परंपरा उन्हें ऋषि-वंशज मानती है।वामपंथियों की अवधारणा – आर्य आक्रांता बनाम मूलनिवासी आदिवासी वामपंथी इतिहासकारों जैसे रोमिला थापर, इरफान हबीब आदि ने “आर्य आक्रमण सिद्धांत” को एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया।आर्य-द्रविड़ संघर्ष का झूठा सिद्धांत रचकर यह दिखाने की कोशिश की गई कि ब्राह्मण और उच्च जातियाँ बाहर से आईं और आदिवासियों को जंगल में खदेड़ा।यह वैचारिक रूप से मार्क्सवादी संघर्ष सिद्धांत का ही जातीय संस्करण था – “वर्ग युद्ध” को “जाति युद्ध” में बदलने का षड्यंत्र। मिशनरी एजेंडा – आदिवासियों को हिंदू से अलग बताना अमेरिका और यूरोप की चर्च संस्थाएं आदिवासी क्षेत्रों में यह प्रचार करती हैं कि वे “हिंदू नहीं”, बल्कि “स्वतंत्र समुदाय” हैं।चर्च-प्रायोजित NGOs धर्मांतरण को “सामाजिक न्याय” के नाम पर प्रस्तुत करते हैं। मिशनरियों ने “आदिवासी धर्म”, “ईसाई-आदिवासी एकता” जैसे मुहावरे गढ़े ताकि सांस्कृतिक अलगाव को वैचारिक पहचान बना दिया जाए। अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण और भारत को तोड़ने की योजनावर्ल्ड बैंक, फोर्ड फाउंडेशन, ओपेन सोसाइटी जैसे संगठनों ने भारत में लाखों डॉलर ऐसे NGOs को दिए जो आदिवासी क्षेत्रों में हिंदू-विरोधी कार्यक्रम चलाते हैं।United Nations Permanent Forum on Indigenous Issues (UNPFII) में भारत के आदिवासियों को “non-Hindus” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती रही है।यह सब “Breaking India” रणनीति का हिस्सा है – एक ऐसी वैश्विक नीति जिसका उद्देश्य भारत को जातीय, धार्मिक और भाषाई टुकड़ों में तोड़ना है।भारत का सांस्कृतिक सत्य – सभी एक ऋषि-वंश से उत्पन्न हैंऋग्वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत में आदिवासी और वनवासी समाज को सम्मान मिला है – निषादराज, शबरी, गूहम, हनुमान जैसे चरित्र उदाहरण हैं।भारत में कोई भी समाज बाहर से नहीं आया – DNA शोध, पुरातत्व और भाषाविज्ञान यह स्पष्ट करते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की समस्त जनसंख्या विकास की एक सतत प्रक्रिया से गुज़री है।आर्य-द्रविड़ का संघर्ष काल्पनिक है, असल में यह एक संस्कृति, एक मूल, एक जीवनदृष्टि का देश है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि – ‘आदिवासी नहीं, वनवासी’संघ का मत है कि ‘आदिवासी’ शब्द विभाजनकारी है, जबकि ‘वनवासी’ शब्द उन्हें भारत की सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक बनाता है।संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से लेकर वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत तक, इस समाज को भारतीयता के मूलभूत तत्व के रूप में देखा गया है।वनवासी समाज को समाज के हृदय स्थल में रखने की संघ की नीति समरसता का सबसे सशक्त उदाहरण है।वनवासी क्षेत्रों में संघ का कार्य – सेवा, संस्कार और शिक्षावनवासी कल्याण आश्रम 1952 से हजारों विद्यालय, छात्रावास, चिकित्सालय, महिला प्रशिक्षण केंद्र संचालित कर रहा है।एकल विद्यालय योजना के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों में वैदिक, आधुनिक, संस्कारित शिक्षा दी जा रही है।रक्षाबंधन, रामनवमी, गुरुपूर्णिमा जैसे त्योहारों को वनवासी क्षेत्रों में एकात्मता अभियान के रूप में मनाया जाता है।मिशनरियों द्वारा किए गए दुष्प्रचार और हिंसा के उदाहरणझारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर राज्यों में चर्च समर्थित समूहों द्वारा संघ कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुईं।इन क्षेत्रों में सांस्कृतिक संक्रमण का प्रयास किया गया – जैसे ईसाईकरण के बाद टोटेम, पूजा, नामकरण, गीत, नृत्य तक बदल देना।संघ कार्यकर्ताओं ने इन क्षेत्रों में शांति, पुनर्संस्कार और पुनरस्थापना का कार्य किया।
DNA, पुरातत्व और भाषा विज्ञान के प्रमाण – भारतवासी एक ही मूल के हैंIIT खड़गपुर, CCMB हैदराबाद, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधों में स्पष्ट है कि भारत की उत्तर-दक्षिण, वनवासी-ग्रामवासी, ब्राह्मण-दलित सभी जनसंख्या की जेनेटिक उत्पत्ति समान है।आर्य-अनार्य सिद्धांत केवल ब्रिटिश औपनिवेशिक मानसिकता का औजार था।भारत की भाषाएँ, संस्कृति,जीवनशैली, धार्मिक व्यवहार में भिन्नता नहीं, रचनात्मक विविधता है।आदिवासी समाज की सनातन विरासत – लोकसंस्कृति और धर्म रक्षकवनवासी समाज के गीत, नृत्य, अनुष्ठान, त्योहार – सबमें राम, शिव, शक्ति, प्रकृति का स्पष्ट संबंध मिलता है।मध्य भारत के भील, गोंड, सहरिया, पूर्वोत्तर के नागा, मिज़ो, दक्षिण के कोया, टोडा, इरुला जैसे समुदायों की परंपराएं सनातन धर्म से अभिन्न हैं।उन्हें ‘हिंदू नहीं’ कहना उनकी अस्मिता और संस्कृति को अपमानित करना है।9 अगस्त का प्रतिपक्ष – राष्ट्रीय ‘वनवासी गौरव दिवस’ की आवश्यकताअब समय है कि भारत 9 अगस्त को “वामपंथी एजेंडा” के रूप में नहीं, बल्कि “वनवासी गौरव दिवस” के रूप में माने।इसे सनातन संस्कृति के सबसे पवित्र और प्राचीन स्वरूपों के उत्सव के रूप में मनाया जाए।वनवासी समाज की गाथाएँ, परंपराएँ, लोक-पुरुष, लोक-देवियाँ देश को स्मरण कराई जाएँ।समरसता ही भारत की पहचान है भारत का संविधान भी ‘We the People of India’ कहकर एकता की भावना को पुष्ट करता है।संघ का कार्य ‘अलगाव नहीं, आत्मबोध’ का है – वनवासी समाज का हिंदू समाज में स्थान मूल, स्नेह और सम्मान का है।जो भारत को तोड़ने की बात करे – वह ‘भारत विरोधी’ है; जो सबको जोड़ने की बात करे – वही ‘भारत पुत्र’ है।“जोड़े नहीं, तोड़े – यही है वामपंथी विमर्श” “वनवासी : भारत की आत्मा, न कि मिशनरी एजेंडे का माध्यम”“हिंदू समाज का अटूट भाग हैं वनवासी”

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